छोड़ दुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन
भूल अभी से इस जग को
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन
भूल अभी से इस जग को
ताज कर तरल तरंगों को
इन्द्रधनुष के रंगों को
तेरे भूभंगों से कैसे
बिन्ध्वा दूँ निज मृग सा मन
भूल अभी से इस जग को
कोयल का वह कोमल बोल
मधुकर की वीना अनमोल
कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से
कैसे भर लूं सजनी श्रवण
भूल अभी से इस जग को
उषा सस्मित किसलय दल
सुधा रश्मि से उतरा जल
न अधराम्रत ही के मद में
कैसे बहला दूँ जीवन
भूल अभी से इस जग को
- सुमित्रानंदन पन्त