कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं

कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं
या दिल का सारा प्यार लिखूं
कुछ अपनों के जज़्बात लिखूं
या सपनों की सौगात लिखूं,

मैं खिलता सूरज लाल लिखूं
या चेहरा चांद गुलाब लिखूं
उस डूबते सूरज को देखूं
या उगते फूल की सांस लिखूं,

वो पल में बीते साल लिखूं
या सादियों लम्बी रात लिखूं
मैं तुमको अपने पास लिखूं
या दूरी का एहसास लिखूं,

एक अंधे का अरमान लिखूं
या आंखों की मैं रात लिखूं
मीरा की पायल को सुन लूं
या गौतम की मुस्कान लिखूं,

बचपन में बच्चों से खेलू,
जीवन की ढलती शाम लिखूं
सागर - सा गहरा हो जाऊं
या अम्बर का विस्तार लिखूं,

वो पहली - पहली प्यास लिखूं
या निश्छल पहला प्यार लिखूं
सावन की बारिश में भीगूं
या आंखों की बरसात लिखूं,

गीता का अर्जुन हो जाऊं
या लंका-रावन - राम लिखूं
मैं हिन्दू - मुस्लिम में उलझूं
या फिर बेबस इ न्सान लिखूं,

मैं एक ही मज़हब को गाऊं
या हर मज़हब की शान लिखूं,
कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं
या दिल का सारा प्यार लिखूं।

- दिव्य प्रकाश दुबे

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए!

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत कुमार

ज्योति कलश छलके

ज्योति कलश छलके
हुए गुलाबी लाल सुनहरे
रंग दल बादल के
ज्योति कलश छलके।

घर आँगन बन उपवन उपवन
करती ज्योति अमृत से सिन्चन
मंगल घट छलके
ज्योति कलश छलके।

अम्बर कुमकुम कर मड तारे
फूल पंखुडिया पर मुस्काये
बिन्दु तुहिन जल के
ज्योति कलश छलके।

पात पात बिरवा हरियाला
धरती का मुख हुआ उजाला
सच सपने कल के
ज्योति कलश छलके।

उषा ने आँचल फैलाया
फैली सुख की शीतल छाया
निचे आँचल के
ज्योति कलश छलके।

ज्योति यशोदा धरती गैया
नील गगन गोपाल कन्हैया
श्यामल छवि झलके
ज्योति कलश छलके।

- पंडित नरेन्द्र शर्मा

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती

हिम्मत करने वालों कि हार नहीं होति
लहरों से डरकर नैया पार नहीं होति।

नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में सहस भरता है
चढ़ कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी महनत बेकार नहीं होति
कोशिश करने वालों की हार नहीं होति।

डुबकियां सिंधू में गोताखोर लगता है
जा जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते न सहज ही मोती पानी में
बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होति
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होति।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो
जब तक सफल न हो, नींद चैन से त्यागो तुम
संघर्ष करो, मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती
किम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

अब तो पथ यही है

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार
अब तो पथ यही है

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है
एक हल्का सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है
यह शिला पिघले पिघले, रास्ता नम हो चला है
क्यों करूं आकाश की मनुहार,
अब तो पथ यही है

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाये
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाये
एक समझौता हुआ था रोशनी से, टूट जाये
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है।

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है
यह पहाडी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।

- दुष्यंत कुमार

वर दे

वर दे!
वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र-नव
भारत में भर दे!

काट अंध-उर के बन्धनस्तर
बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद - तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद - मंद रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे!


- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

हिमाद्री तुंग शृँग से

हिमाद्री तुंग शृँग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला
स्वतंत्रता पुकारती

अमर्त्य वीर पुत्र हो
दृढ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है
बढे चलो बढे चलो

असंख्य कीर्ति रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह सी
सपूत मातृभूमि के
रुको न शूर साहसी

अरीत सैन्य सिंधु में
सुबविग्न से जलो
प्रवीर हो जयी बनो
बढे चलो बढे चलो

- जयशंकर प्रसाद