वर दे!
वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र-नव
भारत में भर दे!
काट अंध-उर के बन्धनस्तर
बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद - तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!
नव गति, नव लय, ताल छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद - मंद रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे!
- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
हिमाद्री तुंग शृँग से
हिमाद्री तुंग शृँग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला
स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो
दृढ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है
बढे चलो बढे चलो
असंख्य कीर्ति रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह सी
सपूत मातृभूमि के
रुको न शूर साहसी
अरीत सैन्य सिंधु में
सुबविग्न से जलो
प्रवीर हो जयी बनो
बढे चलो बढे चलो
- जयशंकर प्रसाद
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला
स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो
दृढ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है
बढे चलो बढे चलो
असंख्य कीर्ति रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह सी
सपूत मातृभूमि के
रुको न शूर साहसी
अरीत सैन्य सिंधु में
सुबविग्न से जलो
प्रवीर हो जयी बनो
बढे चलो बढे चलो
- जयशंकर प्रसाद
पर्वत प्रदेश में पावस
पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश!
पल पल परिवर्तित प्रकृति देश।
मेख्लाकर पर्वत अपार
अपने सहस्त्र द्रग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार बार
नीचे जल में निज महाकार,
जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!
गिरी का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों से सुन्दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर!
उच्चाकान्छाओं-से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर,
अनिमेष;अटल, कुछ चिंता पर!
उड़ गया, अचानक, लो भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव शेस रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अम्बर!
धँस गए धरा में सभय शाल
उड़ रहा धुआं, जल गया ताल!
यों जलद यान में विचर, विचर
था इन्द्र खेलता इन्द्रजाल!
(वह सरला उस गिरी को कहती थी बादल्घर)
इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी,
सरल शैशव की सुखद सुधि-सी वही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी!
- सुमित्रानंदन पन्त
पल पल परिवर्तित प्रकृति देश।
मेख्लाकर पर्वत अपार
अपने सहस्त्र द्रग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार बार
नीचे जल में निज महाकार,
जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!
गिरी का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों से सुन्दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर!
उच्चाकान्छाओं-से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर,
अनिमेष;अटल, कुछ चिंता पर!
उड़ गया, अचानक, लो भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव शेस रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अम्बर!
धँस गए धरा में सभय शाल
उड़ रहा धुआं, जल गया ताल!
यों जलद यान में विचर, विचर
था इन्द्र खेलता इन्द्रजाल!
(वह सरला उस गिरी को कहती थी बादल्घर)
इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी,
सरल शैशव की सुखद सुधि-सी वही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी!
- सुमित्रानंदन पन्त
मोह
छोड़ दुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन
भूल अभी से इस जग को
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन
भूल अभी से इस जग को
ताज कर तरल तरंगों को
इन्द्रधनुष के रंगों को
तेरे भूभंगों से कैसे
बिन्ध्वा दूँ निज मृग सा मन
भूल अभी से इस जग को
कोयल का वह कोमल बोल
मधुकर की वीना अनमोल
कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से
कैसे भर लूं सजनी श्रवण
भूल अभी से इस जग को
उषा सस्मित किसलय दल
सुधा रश्मि से उतरा जल
न अधराम्रत ही के मद में
कैसे बहला दूँ जीवन
भूल अभी से इस जग को
- सुमित्रानंदन पन्त
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