हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए!

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत कुमार

ज्योति कलश छलके

ज्योति कलश छलके
हुए गुलाबी लाल सुनहरे
रंग दल बादल के
ज्योति कलश छलके।

घर आँगन बन उपवन उपवन
करती ज्योति अमृत से सिन्चन
मंगल घट छलके
ज्योति कलश छलके।

अम्बर कुमकुम कर मड तारे
फूल पंखुडिया पर मुस्काये
बिन्दु तुहिन जल के
ज्योति कलश छलके।

पात पात बिरवा हरियाला
धरती का मुख हुआ उजाला
सच सपने कल के
ज्योति कलश छलके।

उषा ने आँचल फैलाया
फैली सुख की शीतल छाया
निचे आँचल के
ज्योति कलश छलके।

ज्योति यशोदा धरती गैया
नील गगन गोपाल कन्हैया
श्यामल छवि झलके
ज्योति कलश छलके।

- पंडित नरेन्द्र शर्मा

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती

हिम्मत करने वालों कि हार नहीं होति
लहरों से डरकर नैया पार नहीं होति।

नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में सहस भरता है
चढ़ कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी महनत बेकार नहीं होति
कोशिश करने वालों की हार नहीं होति।

डुबकियां सिंधू में गोताखोर लगता है
जा जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते न सहज ही मोती पानी में
बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होति
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होति।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो
जब तक सफल न हो, नींद चैन से त्यागो तुम
संघर्ष करो, मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती
किम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

अब तो पथ यही है

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार
अब तो पथ यही है।

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है
एक हल्का सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है
क्यों करूं आकाश की मनुहार,
अब तो पथ यही है।

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाये
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाये
एक समझौता हुआ था रोशनी से, टूट जाये
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है।

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है
यह पहाडी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।

- दुष्यंत कुमार

वर दे

वर दे!
वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र-नव
भारत में भर दे!

काट अंध-उर के बन्धनस्तर
बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद - तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद - मंद रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे!


- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

हिमाद्री तुंग शृँग से

हिमाद्री तुंग शृँग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला
स्वतंत्रता पुकारती

अमर्त्य वीर पुत्र हो
दृढ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है
बढे चलो बढे चलो

असंख्य कीर्ति रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह सी
सपूत मातृभूमि के
रुको न शूर साहसी

अरीत सैन्य सिंधु में
सुबविग्न से जलो
प्रवीर हो जयी बनो
बढे चलो बढे चलो

- जयशंकर प्रसाद

पर्वत प्रदेश में पावस

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश!
पल पल परिवर्तित प्रकृति देश।

मेख्लाकर पर्वत अपार
अपने सहस्त्र द्रग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार बार
नीचे जल में निज महाकार,

जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!

गिरी का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों से सुन्दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!

गिरिवर के उर से उठ-उठ कर!
उच्चाकान्छाओं-से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर,
अनिमेष;अटल, कुछ चिंता पर!

उड़ गया, अचानक, लो भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव शेस रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अम्बर!

धँस गए धरा में सभय शाल
उड़ रहा धुआं, जल गया ताल!
यों जलद यान में विचर, विचर
था इन्द्र खेलता इन्द्रजाल!

(वह सरला उस गिरी को कहती थी बादल्घर)

इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी,
सरल शैशव की सुखद सुधि-सी वही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी!

- सुमित्रानंदन पन्त