कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं

कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं
या दिल का सारा प्यार लिखूं
कुछ अपनों के जज़्बात लिखूं
या सपनों की सौगात लिखूं,

मैं खिलता सूरज लाल लिखूं
या चेहरा चांद गुलाब लिखूं
उस डूबते सूरज को देखूं
या उगते फूल की सांस लिखूं,

वो पल में बीते साल लिखूं
या सादियों लम्बी रात लिखूं
मैं तुमको अपने पास लिखूं
या दूरी का एहसास लिखूं,

एक अंधे का अरमान लिखूं
या आंखों की मैं रात लिखूं
मीरा की पायल को सुन लूं
या गौतम की मुस्कान लिखूं,

बचपन में बच्चों से खेलू,
जीवन की ढलती शाम लिखूं
सागर - सा गहरा हो जाऊं
या अम्बर का विस्तार लिखूं,

वो पहली - पहली प्यास लिखूं
या निश्छल पहला प्यार लिखूं
सावन की बारिश में भीगूं
या आंखों की बरसात लिखूं,

गीता का अर्जुन हो जाऊं
या लंका-रावन - राम लिखूं
मैं हिन्दू - मुस्लिम में उलझूं
या फिर बेबस इ न्सान लिखूं,

मैं एक ही मज़हब को गाऊं
या हर मज़हब की शान लिखूं,
कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं
या दिल का सारा प्यार लिखूं।

- दिव्य प्रकाश दुबे