ज्योति कलश छलके

ज्योति कलश छलके
हुए गुलाबी लाल सुनहरे
रंग दल बादल के
ज्योति कलश छलके।

घर आँगन बन उपवन उपवन
करती ज्योति अमृत से सिन्चन
मंगल घट छलके
ज्योति कलश छलके।

अम्बर कुमकुम कर मड तारे
फूल पंखुडिया पर मुस्काये
बिन्दु तुहिन जल के
ज्योति कलश छलके।

पात पात बिरवा हरियाला
धरती का मुख हुआ उजाला
सच सपने कल के
ज्योति कलश छलके।

उषा ने आँचल फैलाया
फैली सुख की शीतल छाया
निचे आँचल के
ज्योति कलश छलके।

ज्योति यशोदा धरती गैया
नील गगन गोपाल कन्हैया
श्यामल छवि झलके
ज्योति कलश छलके।

- पंडित नरेन्द्र शर्मा

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती

हिम्मत करने वालों कि हार नहीं होति
लहरों से डरकर नैया पार नहीं होति।

नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में सहस भरता है
चढ़ कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी महनत बेकार नहीं होति
कोशिश करने वालों की हार नहीं होति।

डुबकियां सिंधू में गोताखोर लगता है
जा जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते न सहज ही मोती पानी में
बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होति
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होति।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो
जब तक सफल न हो, नींद चैन से त्यागो तुम
संघर्ष करो, मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती
किम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

अब तो पथ यही है

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार
अब तो पथ यही है

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है
एक हल्का सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है
यह शिला पिघले पिघले, रास्ता नम हो चला है
क्यों करूं आकाश की मनुहार,
अब तो पथ यही है

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाये
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाये
एक समझौता हुआ था रोशनी से, टूट जाये
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है।

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है
यह पहाडी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।

- दुष्यंत कुमार